Sunday, November 17, 2013
Saturday, November 16, 2013
Law graduate's sexual harassment allegation: PIL says women can't be truthful
Law graduate's sexual harassment allegation: PIL says women can't be truthful
Dhananjay Mahapatra, TNN | Nov 17, 2013, 01.46 AM IST
A PIL filed in the Supreme Court on a law graduate's sexual harassment allegation says women can't be truthful.
NEW DELHI: An advocate, who has filed several public interest litigations, on Saturday moved the Supreme Court
seeking action against a website and The Times of India for publishing a
law graduate's account that she was allegedly sexually harassed by a
"recently retired judge".
The advocate, ML Sharma, in his
criminal writ petition said the sole purpose of "this comment in block
(blog), her interview in legal India (Legally India), publication by
Times of India and written petition (sic) by the Attorney General for action within Vishaka judgment
is only to create a discussion to tarnish image and goodwill of the
Supreme Court, its judges and their reputation under allegations of
sexual harassment of ladies as societies sensitive upon ladies sexual
harassment and do not like to hear any truth if such allegation is there
(sic)."
He added that he has "learnt through ancient books
which has already disclosed and established several times that (a) lady
never speak (the) truth. Even for a short benefit or for revenge for
denial (of) her demand she can go up to any extent for revenge. No one
can control her revenge/greed. Upon disclosure of truth she puts herself
as a poor helpless in the world. All empires and fight happened due to
her ego and greed (sic)."
Taking the name of the law graduate who had leveled the allegations, Sharma said she should be asked to provide evidence.
Chief Justice P Sathasivam had promptly set up a 3-judge panel
comprising Justices R M Lodha, H L Dattu and Ranjana P Desai to inquire
into the veracity of her statements. The panel has requested her to
appear before it on Monday.
Sharma said: "The scenario is
nothing more than a process to tarnish (the) credibility of the Supreme
Court judges, which must be dealt carefully (sic) with further action
against Times of India, block (blog) and legal India (Legally India) for
publishing such defamatory interview."
"This court must take
action and direction against such newspapers and web for publishing any
such statement without having any evidence in hand. It is not court
proceeding what has been published (sic)," he said.
Referring
to the law graduate's allegation that the incident of sexual harassment
happened in a hotel room, he said: "Hotel evidence must be called upon
what she has whispered and if no such evidence is there than she, Times
of India, block (blog) and legal India (Legally India) must be
prosecuted for such defamatory action. Role of Attorney General also
required to be considered within my apprehension (sic)".
उप्र सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में फंसा आरक्षण का पेंच : नियुक्तियां और बिलम्बित होने की सम्भावना
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में रिक्त आठ सूचना आयुक्तों की नियुक्ति
दिन प्रतिदिन नए विवादों में फंसती जा रही है या यूँ कहें कि सरकार की मंशा ये नियुक्तियां
लोक सभा चुनावों के बाद करने की है ताकि निरंकुश होकर मनमानी नियुक्तियां कर सकें
lसम्भवतः यही कारण है कि प्रदेश में सूचना के अधिकार के नोडल विभाग ( प्रशासनिक सुधार
विभाग ) और मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा नित नए नए उपक्रम कर ऐसे शगल किये जा रहे हैं
कि ये नियुक्तियां लटकी रहे l
प्रशासनिक सुधार विभाग द्वारा पहले नियुक्ति हेतु विज्ञापन जारी
किया गया जिसमें शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य की गयी , फिर संशोधित विज्ञापन जारी कर शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता
को समाप्त किया गया तथा अभ्यर्थियों से दो
हज़ार रुपये का शुल्क लेने के बाबजूद चयन के आधार पर नियुक्तियां करने के स्थान पर नामांकन
के आधार पर नियुक्तियां करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है जो यह स्थापित करती है कि
सरकार की मंशा इन नियुक्तियों की प्रक्रिया में इतनी गलती कर देने की है कि उन्हें
न्यायालय में चुनौती देकर कोई भी रुकवा सके और सरकार सूचना के अधिकार के दवाव से मुक्त रह कर मनमानी
कर सके l मेरा मानना है कि यदि योग्यता के आधार नियुक्ति की जातीं तो समिति में मतभेद
का प्रश्न ही नहीं था l समिति के सदस्यों द्वारा इतना अधिक मतभेद होना कि निर्णय लेना
भी सम्भव न हो , यह सिद्ध करता है कि समिति चयन नहीं कर रही है अपितु बारगेनिंग कर
नामांकन ही हो रहे हैं जो किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है l
मैंने बीते 19 अगस्त को सूबे के मुखिया को सूचना आयुक्तों की नियुक्ति
में नियमानुसार आरक्षण व्यवस्था लागू करने का अनुरोध किया था l यह पत्र नियमानुसार
प्रशासनिक सुधार विभाग को संदर्भित होना चाहिए था किन्तु मुख्यमंत्री कार्यालय ने उस समय यह पत्र जानबूझकर सूचना विभाग
को अंतरित किया ताकि आरक्षण के सम्बन्ध में ससमय निर्णय न लिया जा सके और प्रकरण उलझा
रहे l
अब सूचना विभाग के संयुक्त सचिव डा० अनिल कुमार ने मुख्यमंत्री
द्वारा सूचना आयुक्तों की नियुक्तिओं में आरक्षण व्यवस्था लागू करने सम्बन्धी मेरा
मांग पत्र प्रशासनिक सुधार अनुभाग-2 के सचिव
को आवश्यक कार्यवाही हेतु अंतरित किया है l
सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता
बाली तीन सदस्यीय समिति की बैठक हो चुकी है और आठ नामों की संस्तुति राजभवन को किये
जाने की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है ऐसे में प्रशासनिक सुधार विभाग द्वारा इस
इस पत्र पर कार्यवाही किये जाने की स्थिति में सूचना आयुक्तों की नियुक्तिओं के और
लटकने की सम्भावना है l
प्रशासनिक सुधार अनुभाग-2
के सचिव को अंतरित पत्र की स्कैन्ड कॉपी संलग्न है l
उप्र सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में आरक्षण का पेंच
http://khabar.ibnlive.in.com/latest-news/news/-2111442.html?ref=hindi.in.com
»
देश
उप्र सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में आरक्षण का पेंच
Updated Nov 16, 2013 at 06:58 am IST |
प्रशासनिक सुधार विभाग द्वारा पहले नियुक्ति के लिए विज्ञापन
जारी किया गया, जिसमें शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य की गई। फिर संशोधित
विज्ञापन जारी कर शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता को समाप्त किया गया तथा
अभ्यर्थियों से दो हजार रुपये शुल्क लेने के बावजूद चयन के आधार पर
नियुक्तियां करने के स्थान पर नामांकन के आधार पर नियुक्तियां करने की
प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
उर्वशी शर्मा के मुताबिक इससे पता चलता
है कि सरकार की मंशा इन नियुक्तियों की प्रक्रिया में इतनी गलती कर देने की
है कि उन्हें न्यायालय में चुनौती देकर कोई भी रुकवा सके और सरकार सूचना
के अधिकार के दवाव से मुक्त रह कर मनमानी कर सके।
उर्वशी के मुताबिक
यदि योग्यता के आधार नियुक्ति की जाती तो समिति में मतभेद का प्रश्न ही
नहीं था। समिति के सदस्यों द्वारा इतना अधिक मतभेद होना कि निर्णय लेना भी
सम्भव न हो, सिद्ध करता है कि समिति चयन नहीं कर रही है बल्कि मोलभाव कर
नामांकन हो रहे हैं, जो किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है।
उर्वशी
ने बताया कि उन्होंने बीते 19 अगस्त को सूबे के मुखिया को सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति में नियमानुसार आरक्षण व्यवस्था लागू करने का अनुरोध किया था।
यह पत्र नियमानुसार प्रशासनिक सुधार विभाग को संदर्भित होना चाहिए था,
लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने उस समय यह पत्र जानबूझकर सूचना विभाग को
अंतरित किया ताकि आरक्षण के सम्बन्ध में ससमय निर्णय न लिया जा सके और
प्रकरण उलझा रहे।
उर्वशी के मुताबिक अब सूचना विभाग के संयुक्त सचिव
डॉ. अनिल कुमार ने मुख्यमंत्री द्वारा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में
आरक्षण व्यवस्था लागू करने सम्बन्धी उनके मांग पत्र को प्रशासनिक सुधार
अनुभाग-2 के सचिव को आवश्यक कार्यवाही के लिए अंतरित किया है। सूचना
आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन
सदस्यीय समिति की बैठक हो चुकी है और आठ नामों की संस्तुति राजभवन को किए
जाने की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। ऐसे में प्रशासनिक सुधार विभाग
द्वारा इस पत्र पर कार्रवाई किए जाने की स्थिति में सूचना आयुक्तों की
नियुक्ति में और विलंब होने की सम्भावना है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
उप्र सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में आरक्षण का पेंच
उप्र सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में आरक्षण का पेंच (19:46)
लखनऊ, 16 नवंबर (आईएएनएस/आईपीएन)। उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में रिक्त आठ आयुक्तों की नियुक्ति दिन प्रतिदिन नए विवादों में फंसती जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने इस सम्बन्ध में कई सवाल उठाए हैं।
लखनऊ, 16 नवंबर (आईएएनएस/आईपीएन)। उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में रिक्त आठ आयुक्तों की नियुक्ति दिन प्रतिदिन नए विवादों में फंसती जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने इस सम्बन्ध में कई सवाल उठाए हैं।
Wednesday, November 13, 2013
More Undertrials than convicts in UP jails
http://journeyline.in/newsdet.aspx?q=38327
|
उत्तर प्रदेश में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में समाज के सभी क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व की मांग
उत्तर प्रदेश में शीघ्र
ही सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां होने बाली है l उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान
लेकर सुनी गयी पीआईएल के आदेश के बाद अब चल रही अवमानना याचिका के बाद सरकार पर ऐसा
करने का दवाव भी है l अब सरकार के पास बचने का कोई वहाना भी नहीं है पर शायद अब सबसे
बड़ी परेशानी नियुक्ति के बाद छूट गए उन असंतुष्टों की बजह से है जो सरकार से अब तक आस लगाये बैठे हैं l फिर विपक्ष
और राजभवन को संतुष्ट भी तो करना है l इस मकड़जाल में उलझी नियुक्तियां सरकार के लिए
गले की हड्डी बनती जा रहे हैं l
यही कवायद 2012 में भी
हुई थी l तब
सूबे के मुख्यमंत्री
अखिलेश यादव ने
सुनीता चार्ल्स ,सैय्यद हैदर
अब्बास रिज़वी ,राजकेश्वर सिंह
, शशिकांत शर्मा,गजेन्द्र यादव,मोहम्मद उस्मान, अरविन्द
सिंह बिष्ट और पारस
नाथ गुप्ता के
नाम अंतिम कर
अनुमोदन के लिए
राज्यपाल को भेजे
थे किन्तु राज्यपाल
द्वारा मात्र समाचार पत्रों
में प्रकाशित मां
o सर्वोच्च
न्यायालय के निर्णय के
अंशों का संज्ञान
लेकर पत्रावली
पर अनुमोदन नहीं
दिया था एवं
पत्रावली दिनांक 16-09-12 को पुनर्विचार
हेतु मुख्यमंत्री को
बापस भेज दी
थी जिसकी परिणति
में पदों को
विज्ञापित किया गया और
एक बार पुनः
पत्रावली राज्यपाल के
पास पंहुचने बाली
है l सत्ता
के गलिआरों में
यह चर्चा आम
है कि किन्ही
नामों पर सहमति
न होने के
कारण राजभवन ने
उस समय सहमति
नहीं दी और
उच्च न्यायालय के
निर्णय को ढाल
बनाया l अब तो
मा o न्यायालय
का निर्णय भी
आ गया है
और प्रचुर मात्रा
में योग्य अभ्यर्थी
भी उपलब्द हैं
l ऐसे में सरकार
द्वारा स्पस्ट निर्णय लेने
में देरी करने
से मेरे मन
में सरकार की
भूमिका के प्रति
संदेह उत्पन्न हो
रहा है l
मैंने सूबे के राज्यपाल
को सम्बोधित एवं मुख्यमंत्री को पृष्ठांकित ज्ञापन के माध्यम से एक बार पुनः उच्च न्यायालय
का निर्णय उपलब्ध कराते हुए उन्हें याद दिलाया है कि वे उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के आठ आयुक्तों की
नियुक्तियाँ संवैधानिक व्यवस्थाओं ,सूचना का
अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय 4 की धारा 15
एवं मा o सर्वोच्च न्यायालय के आदेश
दिनांक 03 सितम्बर 2013 में प्रतिपादित व्यवस्थाओं के अनुसार समाज के सभी क्षेत्रों
का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हुए कराने
की कृपा करें ताकि समाज के सभी क्षेत्रों के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति सूचना आयुक्त के पद
पर चयनित होकर सूचना के अधिकार की मूल भावना के अनुरूप लोक प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली
में पारदर्शिता एवं जवावदेही का संवर्धन कर प्रदेश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने में अपनी
उपादेयता सिद्ध कर सकें और देश के नागरिक भी अवांछनीय उत्पीड़न से बचे रहे l
भेजे गए ज्ञापन की मेल निम्नानुसार हैl
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